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कुंडलिया छंद
मूछें
मूछें सबकी शान हैं, रखिए इनकी लाज।
मूछों की किस्में बहुत, अलग—अलग अंदाज।
अलग—अलग अंदाज, कुछ बरछी तलवार सी।
कुछ ऐंठीं, कुछ उठीं कुछ लम्बी पतवार सी।
ईश्वर को प्रिय लगें, न मानें सबसे पूछें।
झड़ते सिर के बाल, पर झड़े कभी न मूछें।
सफाचट मूछें
साले की बारात में, रोब हो गया हाफ।
नाई ऐसा पिल पड़ा, मूछें कर दीं साफ।
मूछें कर दीं साफ, सफाचट ही अव रखता।
साली की है राय, कि अव मैं सुन्दर लगता।
लूं लगाम मुंह बाय, पड़ा साली के पाले।
रिश्ते कितने सुन्दर, सालियां, सलहज, साले।
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डॉ0 दिनेश चंद्र अवस्थी का रचना संसार।
कुंडलिया छंद
कुंडलिया छंद
मूछें
मूछें सबकी शान हैं, रखिए इनकी लाज।
मूछों की किस्में बहुत, अलग—अलग अंदाज।
अलग—अलग अंदाज, कुछ बरछी तलवार सी।
कुछ ऐंठीं, कुछ उठीं कुछ लम्बी पतवार सी।
ईश्वर को प्रिय लगें, न मानें सबसे पूछें।
झड़ते सिर के बाल, पर झड़े कभी न मूछें।
सफाचट मूछें
साले की बारात में, रोब हो गया हाफ।
नाई ऐसा पिल पड़ा, मूछें कर दीं साफ।
मूछें कर दीं साफ, सफाचट ही अव रखता।
साली की है राय, कि अव मैं सुन्दर लगता।
लूं लगाम मुंह बाय, पड़ा साली के पाले।
रिश्ते कितने सुन्दर, सालियां, सलहज, साले।
प्रस्तुतकर्ता
डॉ0 दिनेश चंद्र अवस्थी
पर
11:58 am
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- डॉ0 दिनेश चंद्र अवस्थी
- विशेष सचिव एवं वित्त नियंत्रक, विधान सभा, उत्तर प्रदेश, लखनऊ।
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